Monday, 19 August 2013


कदम उठते है और वापस हाशिये में लौट आते है 
मज़बूरी कहूँ या हालात 
मन ऊँचाई भरे और 
हाथ चूल्हे पर रोटिया सेके 
राख पर लिखती कई बार नाम अपना 
चुभती आवाज़ से जो खुद मिट जाते है 
सवेरे से जो चलती है उहा पोह की ज़िन्दगी 
सिर्फ अपने सिवा बाकी सबके लिए रूकती है
बंधन नहीं है पर जिम्मेदारियों की जंजीरे 
बन पैरों में पायल संग अपना एहसास दिलाती है 
आँचल सर पर लाज, इज्ज़त का सही 
पर ये भी निगाहे न उठे पहरा लगाता है 
फैले झंझटों को समेटती हर आह मेरी 
फिर भी कभी नहीं कोई वाह मिलती है 
वक़्त ने कुछ यूँ छीने अरमां मेरे 
कब बेटी से पत्नी और कब माँ बनी 
देखी नहीं ये सीढियाँ कैसे कब इतनी जल्दी बदलती है 
सोचती तो रोज़ हूँ आज नया आसमा तलाश करू 
पुकार सुन सुन उमंगो की ओढ़नी भीग जाती है 
और रह जाते है भीगे सपने,ठिठुरती आशाएं और मैं 
परिवार की सुध में अपनी इच्छाएं मर जाती है 
मैं अपनी उम्मीदों को पल्लू में गाठ बांध 
जीवन दौड़ में धीमें कदमों से अपना धर्म निभाती हूँ 
और जब भी .......
कदम उठते है फिर वापस हाशिये में लौट आते है

2 comments:

  1. स्त्री जीवन की बहुत सुदर और वास्तविक प्रस्तुति।
    वाह...!

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