Tuesday, 20 May 2014

हे मन कर कल्पना
बना फिर अल्पना
खोल कर द्वार
सोच के कर पुनः संरचना
हे मन कर कल्पना

क्यूँ मौन तू हो गया
किस भय से तू डर गया
खड़ा हो चल कदम बढ़ा
करनी है तुझे कर्म अर्चना
हे मन कर कल्पना

छोड़ उसे जो बीत गया
भूल उसे जो रीत गया
निश्चय कर दम भर ज़रा
सुना समय को अपनी गर्जना
हे मन कर कल्पना

पथ है खुला तू देख तो
नैनो को मीच खोल तो
ऊंचाई पर ही फल मीठा मिले
बिन गाये नहीं होती वन्दना
हे मन कर कल्पना

किनारे छोड़ नदी में उतर
तैर कर असत्य पार आ
बिन मरे न कोई स्वर्ग पाये
गढ़नी है तुझे नयी अभिव्यंजना
हे मन कर कल्पना……



Wednesday, 16 April 2014

कालिख़
विकृत ख़यालों की
कुरूप मानसिकता की
जमती जाती कुरूतियों की
बहुत चीकट कई परतों वाली

मोटी
चमड़ी जैसी
घिनौनी रूप में जीवित है
उस इंसान में जो
मानवीय अहसासों के साथ
पल पल खेलता है
उन्हें तोड़ कर मरोड़ कर
आनन्द लेता है

अहसासों के ज़िस्म को
नोचता, खरोंचता
दबोचता नीले-नीले निशान
बना कर
उनका उपहास बनाता है

मानव 
का जन्म ही प्रेम है
उसका जीवन प्रेम की
निशानी और 
प्रेम की धरोहर है

फिर कैसे ?
एक प्रेम का बीज
फलाहारी वृक्ष बनते-बनते
काँटों से लिप्त, दुर्गन्ध सहित
गला, सड़ा, विषैला, जंगली
झाड़ बन जाता है
कैसे??

जन्म तो 
मानव रुपी ही था
फिर परवरिश में क्या हुआ
क्यूँ उसका पालन-पोषण
कुण्ठित और अपाहिज़
बन गया

या 
यूँ कहूँ कि
बीज के पौध बनने से पहले ही
उसे कीड़ा खा गया

स्वार्थ का कीड़ा, बदले का कीड़ा 
असामाजिकता का कीड़ा
जो ज़हरीला और रोगी है
जिसने न जाने कितने ही
परिवारों को नष्ट किया
सोच को नपुंसक बना दिया
जिसके होने से
संस्कारों को लकवा मार गया
और आदर-सम्मान कि बातें
दीमक खा गयी

कैसे 
बचायें प्रेम के 
अनुसरण पाते पौध को
कैसे रोकें 
इनके विनाश को 
कैसे??........

Friday, 7 March 2014

मैं प्रकृति मैं दुनियाँ
फिर भी कमज़ोर और असहाय
इसलिए नहीं की मुझमें साहस नहीं
इसलिए की मुझमें नफ़रत नहीं

मैं जननी मैं देवी
फिर भी पैरों तले मेरी ज़बां
इसलिए नहीं की मुझमें आवाज़ नहीं
इसलिए की मुझमें शोर नहीं

मैं चाहत मैं दुआ
फिर भी बदचलन और कुल्टा
इसलिए नहीं की मुझमें आग नहीं
इसलिए की मुझमें जलन नहीं

मैं श्रृष्टि की रचनाकार
फिर भी हाथों से बेक़ार, पैरों से लाचार
इसलिए नहीं की मुझमे ज़ज्बा नहीं
इसलिए की मैं निर्थक नहीं, स्वार्थी नहीं, कठोर नहीं

मैं औरत हूँ
शांत हूँ इसलिए दुनिया है
न करो इतना विवश की हहाकार मच जाये
न करो इतना अत्याचार की बाग़ लूट जाये

मैं बनाती हूँ इसलिए मिटा भी सकती हूँ
पर मैं कुम्हार हूँ, ठेकेदार नहीं
जो करती व्यापार नहीं…………

लघु कथा .....

बहुत हुआ पिता जी अब आप माँ पर हाथ नहीं उठायेंगे वरना मैं भूल जाऊँगी की आप मेरे पिता है। एक ज़ोर का थक्का देते हुए वर्मा जी ने दिव्या को कहा- अरी जा देखे तेरे जैसे, न जाने किस कि औलाद है, जा मुँह काला कर अपना यहाँ से......

दिव्या ने कानों पर हाथ लगा ज़ोर से चिल्लाई ..... बस चुप। पैर पटकते हुए खीज़ कर दिव्या अपने कमरे की तरफ दौड़ गयी

वर्मा जी का ये बोलना की ''वो न जाने किसकी औलाद है '' सुन कर दिव्या बहुत दुःखी हो गयी। बार बार उसको वही शब्द सुनाई देने लगे, आँखों से झर झर आँसूं बहे जाते और दिव्या हाथों को पीसती जाती।

दिव्या कि माँ रोती हुई उसके कमरे कि तरफ गयी और दरवाज़ा पीटने लगी -दिव्या बेटी दिव्या....... ये आदमी तो सनकी है तू तो समझती है न… दरवाज़ा खोल बेटा……..

पर बहुत समय तक दिव्या कि कोई हरक़त न सुनाई पड़ी तब माँ ने दरवाज़ा पीटा और कोई हरकत न सुनाई देने पर घबरा कर पड़ोसी को बुला दरवाज़ा तोड़ दिया ……..और सामने जो था उसे देख माँ बेहोश हो गयी सामने दिव्या थी। उसने पँखे से लटक कर खुदखुशी कर ली थी………

Thursday, 6 February 2014

दिन अख़बार सा.......

दिन आता है जैसे
रोज़ अख़बार आता है
इका-दुक्का कुछ
आदतन सी ख़बरें
बाक़ी सभी
उबाते चर्चे, बेकार के फजीते
रोज़ पढ़ते है एक
नियम जैसा
कायदें में बँधा है ये
दिन ऐसा
शाम तक बासी हो
जाता है
दिन अखबार सा
रद्दी में बिछ जाता है
अलमारियों में
रंग लाता है
किताबों संग
बीत जाता है और
कभी रोटी संग
मिल जाता है
यूँही दिन भी रद्दी बन
यादों में
सोया रहता है
दराज़ों में
महका रहता है
किताबों में 
जीता रहता है और 
रोटी के लिए 
मरता है
दिन आता है जैसे
रोज़ अख़बार आता है ………..

Wednesday, 5 February 2014

कुछ रिश्ते बेशक़ीमती होते है …….

कुछ रिश्ते अज़ीब,
किसी भी बन्धन से परे ,
आज़ाद पँछी जैसे होते है जो
किसी क़ैद में रहना और
डोर में बंधना पसन्द नहीं करते
जिनका साथ एहसासों में
ख्यालों में, याद में और
अक्सर सपनो में होता है

रोज़ की आपाधापी वाली
ज़िन्दगी से अलग़ जो
अपनी अहमियत शांत
एकल पलों में दर्शाना चाहते है
उनका साथ किसी अन्य
वास्तविक रिश्ते के भाव
से कहीं गहरा होता है

ऐसे रिश्तों की समझ
ईश्वरीय होती है जो
चुप से कहती है और
चुप सी सुनती है
अनोखे, अद्भुत एहसास
होते है इनके
सिर्फ दिल की
ज़ुबां बोलते है और
ख़ामोशी के लफ्ज़ पढ़ते है

कुछ रिश्ते रुहानी होते है
रुह में समाये एक
रुह के लिए ……….
कुछ रिश्ते
अल्फ़ाज़ों से अलग़ जो
इबादत से सहेजे जाते है

कुछ रिश्ते बेशक़ीमती होते है …….

Sunday, 2 February 2014

मेरी पहली लघु कथा ...........

"ऐ मीनरी !! जा जरा पानी तो ले के आ , उफ़ गर्मी भी कितनी हो रही हैं अभी ब्लाक में एक मीटिंग में जाना हैं बेटी बचाओ अभियान की शुरुआत हैं आज वहां "

"इत्ती देर लगे क्या पानी लाने में !! एक तो भगवान् ने मेरी किस्मत में तीन तीन छोरिया लिख दी " ऊपर से सारा दिन किताबो में घुसी रहती है यह नही की घर का कम काज सीखे कलक्टर बनके सर पे नाचने के सपने देख रही ! " राना जी झल्लाते हुए जोर से चिल्लाये और पत्नी डर के मारे पानी का गिलास लिए उनके सामने पल्लू मुह में दबाये आन खड़ी हुयी .. क्या हैं यह !!! हैं !! ज्यादा सर पे न चढ़ा इन बावलियो को एक तो तीन तीन जन दी तूने उस पर सपने देखो इनके महारानियो के, चुपचाप घर का काम काज सिखा इन्हें .....जल्दी ही ब्याह कर दूंगा इनका जाये अपने सासरे कब तक बोझ ढोऊ इनका " " जा मेरा छाता और जूता ले के आ "

राना जी ब्लाक स्तर पर मुख्य पार्टी के अध्यक्ष मनोनीत किये गये थे आज उनको बेटी बचाओ पर भाषण देना था . उनके घर से जाते ही बेटी ने उनकी कुर्सी पर पड़े रह गये कागज को उठाया और जोर जोर से पढने लगी " बेटी किस्मत वालो के घर ही जन्म लेती हैं , उनके होने से घर स्वर्ग बन जाता हैं , एक बेटी को पढ़ाने से दो घरो का भला होता हैं आज बेटियाँ ही बेटो से ज्यादा समाज और संसार में नाम रोशन कर रही हैं ..... बेटी के जन्म को खुले दिल से अस्वीकार करने वाले मानव मात्र पर धब्बा हैं आखिर उन्होंने भी एक माँ की कोख से जन्म लिया हैं .मुझे गर्व हैं मैं तीन बेटियों का पिता हूँ मेरी बेटिया पूरे सम्मान के साथ घर पर अपने ऊँचे सपनो की उड़ान भर रही हैं " पढ़ते पढ़ते मीना की आवाज रूंध गयी आँखे अविरल बहने लगी और उसने डबडबायी आँखों से माँ की तरफ देखा और फूट फूट कर रोने लगी . कागज का पुर्जा हवा में फडफडा रहा था………