Sunday, 8 December 2013


रात का दूसरा पहर 
दूर तक पसरा सन्नाटा और 
गहरा कोहरा 
टिमटिमाती स्टीटलाइट 
जो कोहरे के दम से 
अपना दम खो चुकी है लगभग 
कितनी सर्द लेहर लगती है 
जैसे कोहरे की प्रेमिका 
ठंडी हवा बन गीत गाती हो 
झूम जाती हो 
कभी कभी हल्के से 
कोहरे को अपनी बाहों में ले 
आगे बढ़ जाया करती 
पर कोहरा नकचढ़ा बन वापस 
अपनी जगह आ बैठता 
ज़िद्दी कोहरा प्रेम से परे 
बस अपने काम का मारा 
सर्द रात में खुद का साम्राज्य 
जमाये है हर तरफ
गली, दुकान, बड़े और 
छोटे मकान, पेड़, पौधे 
और सड़कों कि स्ट्रीटलाइट 
पर जमा बैठा है 
सारे लोगों को ठिठुरा कर 
घर भेज दिया

सोचती हूँ 
क़ाश ये कोहरे जैसा कुछ 
मन में भी होता जो 
मन की सड़को से 
चिन्ताओं को ठिठुरा कर 
वापस समय में विलीन कर देता 
और मन को खुद से ढक कर 
एक सुकून भरी रात तो देता मुझे 
काश !!!......

Friday, 6 December 2013


सुनहरी ठंडी धूप 
मीठी सी महक लिए
खिलते फूल 
मचलती टिमटिमाती किरणे 
चेहरे पर पड़ते ही 
दिल छू लेती है 

शाखों से गिरती छाव 
मालूम होता है जैसे 
हाथ हिला कर 
ख़ुशी जताती हो 
मेरे आने की

यूँ समेटे है सूरज 
अपनी रोशनी में इस 
मंज़र को 
जैसे गहरे अंधकार के 
बाद एक दीया 
जला हो 

हरी मखमली घास पर 
यूँ उतरते है 
पेड़ों से पत्ते 
जैसे सूरज की बाहों में 
सभी सोने चले हो 

प्रकृति की सुंदरता 
शब्दों से परे 
जैसे ईश्वर का 
स्वरुप आँखों से परे हो..

Wednesday, 4 December 2013

प्रेम
परिचय को
पहचान बना देता है

पहचान
अपनों को
रिश्ता बना देता है

रिश्ता
लोगों को
कमज़ोर बना देता है

कमज़ोर
इरादों को
अंधकार बना देता है

अंधकार
ज़िन्दगी को
मुश्किल बना देता है

मुश्किल
लोगों को
अनजान बना देता है

अनजान
पहचान को
परिचय बना देता है

परिचय
संवाद को
प्रेम बना देता है

प्रेम
परिचय को
पहचान बना देता है…….

Wednesday, 27 November 2013

दहकता अफगार नज़र आता है
मुझे मेरा प्यार नज़र आता है

बड़ा खौंफज़दा है इंसान
हर बात पर ख़बरदार नज़र आता है

मुल्क की आबोहवा बहकी लगती है
चढ़ता बुखार नज़र आता है

बेखोफ़ है आज का इंसान बड़ा
किसी सल्तनत का ख़रीददार नज़र आता है

ज़िन्दगी कट रही उधारी के चलते
साँसों पर लगा पहरेदार नज़र आता है

नहीं समझते थे तो अच्छा था
समझ का इंसान बीमार नज़र आता है

भरोसे का खून फैला पड़ा है गलियों में
दोस्ती में भी खार नज़र आता है….

Sunday, 24 November 2013

फिराक़-ए-यार के तसव्वूर को
बेवजह ज़ाया न करो

बेशकीमती चीज़ है जनाब
जो ख्यालों में मिला करती है……

Thursday, 21 November 2013

ज़िन्दगी बन्द आँखों में ''अपना ''
खुली आँखों में ''सपना '' है

जिसे मिले जैसी मिले वो उसकी ''मिसाल '' है

हार जाओ तो ''नसीब''
जीतो तो ''जहान '' है ..........

Monday, 11 November 2013


उनके हाथों का स्पर्श 
मुझे आज भी महसूस होता है 
नर्म मख़मली
नाज़ुक परों जैसे
उनकी उँगलियाँ मानो
ठंडी कोमल ओस की 
बूंदों में भीगे ग़ुलाब की 
कली हो जैसे 

बुज़र्गों में हमें सिर्फ 
इक नानी ही तो मिली थी 
इसलिय हम सब बच्चों के लिए 
वही दादा दादी और नाना थी 
पुराने समय कि जरुर थी 
पर समझ हमारे वक़्त की 
रखती थी 
हमारे मज़ाक पर ठहाके 
और हम संग बच्चा बन जाती थी 
कभी लगा ही नहीं की 
नानी हमारी जनरेशन कि नहीं 
उनका जन्मदिन सब के लिए 
त्यौहार होता था 
और हमारा उनके लिए ईद 
वो थी तो परिवार में सब ठीक था 
सब का आना जाना था 
मामा मौसी सब पास थे 
उनके जाने के बाद समय 
सच में मॉडर्न हो गया 
ननिहाल खत्म हो गया 
मामा मौसी भी ओर छोर हो गए 
बच्चे सब बड़े हो गए 
समय भी मिलना समाप्त हो गया 
कभी कभी लगता है 
सब पा कर भी हमने सब खो दिया 
एक ईंट क्या निकली दीवार से 
अपना घर ढहा दिया 
जब कभी आते जाते 
किसी बुजुर्ग को देखती हूँ 
मन करता है पास जा कर 
हाथ थाम लूँ और एक बार 
फिर वो नर्म मखमली 
एहसास समेट लूँ 
अपने हाथों में 
किसी बुजुर्ग का होना 
कैसा होता है घर में 
ये केवल 
बरगद के पँछी ही बता सकते है.....