Saturday, 14 September 2013

'क्षणिका'......

हिंदी पर
बिंदी का नहीं
अब किसी
को पता
पीढ़ी दर पीढ़ी
बिगडती
दशा .....

कुछ अधखुले बीज....


कुलबुलाते कुछ अधखुले बीज
मेरे बरामदे के कोने में पड़े हैं
शायद माँ ने जब फटकारे
तो गिर गए होंगे
बारिश के होने से कुछ पानी और
नमी भी मिल गयी उन्हें
सफाई करते ध्यान भी नहीं दिया
बड़ी लापरवाह है कामवाली भी
दो दिन हुए हैं और बीजों ने
हाथ पैर फ़ैलाने शुरू कर दिए
हाँ ठीक भी तो है
मुफ्त में मिली सुविधा से
अवांछित तत्व फलते-फूलते ही हैं
पर अब जब वो यूँही रहे तो
बरामदे में अपनी जड़े जमा लेंगे
फिर ज़मीन में पड़ेंगी दरारे भी
मेरी माँ का खूबसूरत सा
बरामदा चटखने लगेगा
माँ को दुःख होगा...
क्यों न मैं ही इसे हटा दूँ अभी
इसकी बढ़ती टांगों से पहले
कल को ये घर में बदसूरती लाये
क्यों न मैं ही इसका वजूद मिटा दूँ
या इसे एक नयी ज़मी दूँ
जहाँ ये पनप सके.....जन्म ले सके
अभी ये नापसंद है माँ को
तब ये माँ का दुलार पा सके
एक हिस्सा बन जाये शायद
माँ के इस बरामदे का
खिली पत्तियाँ और रंगीन फूलों से
तब माँ को ख़ुशी होगी
और मुझे भी....

Monday, 9 September 2013

हँस भी सकते है
रो भी सकते है
ये देश का मामला है
आप गा गा के मांग भी सकते है ......
सच को झूठ
कहने में क्या जाता है,
जिन्दा लोग नहीं मिलेंगे
यहाँ खामोश को लाश
कहने में क्या जाता है...
बैठ लो बस
करीब महंत के
खुद को पंडित
कहने में क्या जाता है...
करते रहो बलात्कार
जैसे अत्याचार
खुद को पवित्र
कहने में क्या जाता है...
भर देना नोटों से जेबें
सभी की फाइले गायब
करने में क्या जाता है...
दोषों से पल्ले यूँ
झाडेंगे पल में
घर की खेती बीमार
पड़ जाने में क्या जाता है...
देख कर तो
खरबूजा भी रंग बदले
व्यक्ति के गिरगिट
बन जाने में क्या जाता है...
सत्य की खुजली लगी
जो न मिटे
सत्यवान को
मिटाने में क्या जाता है...
देश गया देशवासी गया
आज के दोर में
भ्रष्टाचारी बनने में क्या जाता है...
गरीबी, भूखमरी,
सूखा, आकाल
सब दिमागी फ़ितूर
बोलने में क्या जाता है...
शिक्षा के बाज़ार में
आरक्षण के नाम पर
साल बरबाद किये
जाने में क्या जाता है...
सरकार के लिए
चिल्लाते सभी
वोट के नाम पर घर बैठ
जाने में क्या जाता है...
अपना गुस्सा
मासूमो पर निकालना
मार काट कर व्यवस्था
कहने में क्या जाता है...
किस के हाथ में देश अपना?
कौन अपना?
अपने को विरोधी कह
देने में अब क्या जाता है...
कोई तो सच का दमन थामे
इन्सां जागे कोई
यूँ भीड़ से अलग
चलने में क्या जाता है....

Monday, 2 September 2013


तिनके - तिनके समेट 
बुन रही अपना 
आशियाना 
सबसे ऊँची डाल तलाशी 
हो न जाये कहीं 
बैरी का निशाना 
अरमां कई पाल रही 
सपनों से घर सजा रही 
आसमां के उड़नखटोले पर 
जीवन अपना उतार रही 
परिवार अपना बनाना 
हर बुराई से उसको बचाना 
करना है कठिन जतन 
अपने बच्चो को आदर्श बनाना 
यूँ बुनूंगी हर रेशा घास का 
मेरे लाड़ की 
गर्माहट उसमें समाएगी 
हर मौसम से मेरे 
घरोंदे की दीवारें 
बच जायेंगी 
है पता हर मंशा का मुझे 
सोच समझ कर 
बढ़ना है मुझे 
अपनों का ख्याल 
पहले है मुझे 
अपना आशियाना 
करना सुरक्षित है मुझे...

Saturday, 31 August 2013




नज्मों को सांसें
लम्हों को आहें
भरते देखा
अमृता के शब्दों में
दिन को सोते देखा
सूरज की गलियों में
बाज़ार
चाँद पर मेला लगते देखा 
रिश्तों में हर मौसम का
आना - जाना देखा
अपने देश की आन
परदेश की शान को
देसी लहजे में पिरोया देखा
मोहब्बत की इबारत को
खुदा की बंदगी सा देखा
अक्सर मैंने अपने आप को
अमृता की बातों में देखा
शब्द लफ्ज़ ये अल्फाज़
अमर है तुमसे
हाँ, मैंने तुम्हें जब भी पढ़ा
हर पन्ने पर तुम्हारा अक्स है देखा
अमृता, तुम नहीं हो फिर भी
आज हर लेखक को
बड़ी शिद्दत से
तुम्हें याद करते देखा


सरकार नाम की 
न समाज काम का 
अपनी सुरक्षा 
खुद करो लड़कियों 
हथियार उठाओ लड़कियों 

रोज़ के तमाशे लगते 
भीड़ लगती 
हटती 
अपनी आन 
को मजाक 
न बनने दो लड़कियों 
हथियार उठाओ लड़कियों 

गर नियम 
सिर्फ हम निभाये 
तो ऐसे कानून को आग 
लगा
तेश को फिर 
हवा दो लड़कियों 
हथियार उठाओ लड़कियों 

बराबरी का 
हक़ देते 
देवी से तुलना करते 
ढोंगी पाखण्डी कितना 
ये समाज 
गिरा है देख लो 
लानत ऐसे समाज को 
न दे जो नज़रों 
में इज्ज़त
तुमको लड़कियों
हथियार उठाओ लड़कियों

मत रहो 
किसी की मोहताज़ 
बनो अपनी 
शक्ति लड़कियों 
नहीं किसी सरकार 
किसी कानून की 
किताब में 
तुम्हारा हित 
लड़कियों 
वक़्त अब यही 
तुम 
हथियार उठाओ लड़कियों