Thursday, 18 July 2013

जब सोचने का नज़रिया 
बदल जाये तो 
राहें भटक जाया करती हैं,
मंजिलें तब दूर कहीं 
खो जाया करती हैं...
काफिले के संग 
चल निकलो तो बात अलग,
वर्ना परछाईं भी अक्सर 
साथ छोड़ जाया करती है...
वो लोग अलग होते हैं
जो डूब के पार निकलते हैं,
हौसलों से तो बिन पंख भी 
ऊँची उडान भरी जाया करती है...
स्वार्थी की कोई ज़ात नहीं 
जानवरों सा जीवन उसका,
इंसान को तो चुल्लू भर पानी में भी 
मौत आ जाया करती है...
ऊपर वाले ने भी 
खेल अजीब खेला है,
जो दुनिया उजाड़े किसी की 
किस्मत उसी को मिल जाया करती है,
'पियू' और क्या लिखे उसके सामने 
प्यार करने वालों की तो अक्सर
लकीरें भी धोखा दे जाया करती हैं...

Monday, 8 July 2013





ये किस्मत का दोष है या 
अपनों से मिला रोष है 
उम्र के अंतिम पड़ाव में 
इस सूखी धरती पर मैं भूखा 
तन पर गरीबी की चादर तक नहीं 
पेट में मांग कर खायी गयी 
एक रोटी भी नहीं 
किस ओर तलाश करूँ कुआँ अपना 
बरसों से खाया नहीं भर पेट
ना देखा कोई सपना 
अपनों की परिभाषा मैं भूल चुका हूँ 
परिणाम अच्छाई का भूगत चुका हूँ 
अब नहीं किसी से कोई आशा 
ज़ख्म अपने खून से ही खा चुका हूँ 
अब जब तक ज़िन्दगी 
गिरते उठते चलनी है 
तो रोज़ प्याला भरना है 
मुझे इस जंगली भूमि को 
अपने पसीने से सीचना है 
भूखा हूँ थका नहीं 
रुका हूँ थमा नहीं 
बूढ़ा हूँ पर मरा नहीं
बैठ लूँ फिर शुरू करूँगा 
मशीन नहीं इन्सान हूँ
हौसलों की जान हूँ 
मैं एक किसान हूँ...

Wednesday, 3 July 2013

मैं और भाई साथ .....



मैं और भाई साथ 
फिर रिमझिम बरसात 
अपनी कागज़ की कश्ती 
कश्ती और उन पर 
पतंगे भी हुए सवार 
दूर तक आती माँ की डाँट
भाई में भीग रही 
सुन भाई 
थोडा छाता मुझे भी बाँट 
मैं भीग गयी जो 
माँ तुम्हे बहुत डाँटेगी 
पता है फिर न लाओगे तुम साथ 
ठंडी हवा ये सुहाना मौसम 
चलो यही खेले भाई हम तुम 
अभी नहीं जाना 
मिल के खेले कुछ देर साथ 
चलेंगे माँ जब फिर आवाज़ देगी 
तब तक मज़े ले
इस बरसात के साथ

Sunday, 23 June 2013




मैं राधा तू मोहन मेरा
काहे को ब्रज से दूर तू जावे
ऐसो कौन है मोते प्यारो
के रोवत मोहे छोड़ तू जावे
कैसे कहूँ के मन व्यकुलाये
कहीं भी तुझ बिन ठौर पाये
कभी इत जाये कभी उत जाये
रे मोहन तू काहे आये....

ठहरे ना वावला होइ जाये
रह - रह के ह्रदय कुलबुलाये
सोचन ना दे मति भरमाये
तरसें आखियां दरस को हरदम
टुकुर टुकुर बस राह टुकुरायें
रे मोहन तू काहे आये....

जैसे बैरी बेदर्दी होइ जाये
लागे तोहे बैरन की हाये
मोसे तोरी प्रीत तो गहरी
पर सौतन को भय है सताये
तू सीधो वो तेज़ पड़ी तो
सोचके मन बस बैठा जाये
रे मोहन तू काहे आये....

करूं मनुहार प्रभु के आगे
करे कृपा तोहे मेरा राखें
तप जप व्रत सब मोहे आवे
दूंगी परीक्षा जो तू आवे
दिन ते अब लग सांझ भयी
मोरे नैनन की आस गयी
विकट समय ये बहुत रुलाये
रे मोहन तू काहे आये.....

Saturday, 22 June 2013




भयानक है ये रूप
नहीं देखा जाता 
प्रकति का ये विकराल रूप 
अपनी ही संतान को 
मिटाने पर तुली क्यूँ 
नष्ट कर रही क्यूँ अपनी ही रचना 
नहीं देखा जा रहा इतना विकृत स्वरुप
माना गलती अपनी ही है तुझे जो परेशां किया 
पर किया क्या इतना जघन्य अपराध 
जो तूने बदला यूँ लिया 
अपनी ही बनायीं स्रष्टि को 
क्यूँ तू उजाड़ रही ......
नहीं देखा जाता प्रकति तेरा रूप ये …नहीं देखा जाता
सबने क्या तेरा बिगाड़ा 
क्यूँ सर से माँ का साया छीन लिया 
बच्चे बिलखते रह गये 
पिता चिर निंद्रा में सो गया 
बहन ने भाई से जो वादा लिया 
भाई ने पत्नी को जो वचन दिया 
क्यूँ छिन्न भिन्न वो हो गया 
इच्छा थी प्रभु दर्शन की 
क्यूँ अपने ही पास बुला लिया 
करुण वेदना सुनी नहीं जाती प्रकति की ये 
त्रासदी देखी नहीं जाती .....
उस संगिनी का साथ देखा …..
अपने पति से प्यार देखा
गले लगा के उसके शव को रोते बिलखते देखा ....
आप को कुछ नही होगा 
आप को कुछ नही होगा ….
उसकी व्यथा को महसूस कर देखा 
दिल फूट पड़ा है इस दुःख पर 
कभी ऐसा मंज़र न देखा....
इसपर मौका परस्त इन्सान भी आया
जिसे रहम न बिलकुल आया 
अपनी जेबें कैसे भरे लिए मन वो 
अपनी औकात पर आया 
क्यूँ दिल नहीं पसीजा रोता बिलखता देख
एक हाथ बढ़ाते तो शायद हौसलो को जान मिले...
वक़्त कठिन है साथ निभा लो 
कल शायद ये समय फिर आये 
तो अभी से अपनी राह बनालो 
प्रकति ही तो विकराल हुई है 
इंसानियत क्यूँ सोयी पड़ी है 
रो रहा दिल जान कर ये सब 
उनकी क्यूँ ना नज़र पड़ी है 
बेबसी ये बढती चली है.....
अपने हाथों को थोडा कष्ट सब देना 
अपने लोगों के लिए प्रार्थना करना 
कोई भी जननी हत्यारिन नहीं बन जाती 
जब तक संतान ही उसको नहीं सताती 
प्रकति का क्रोध समझो दोस्तों 
मिलकर सहयोग करो दोस्तों...

Wednesday, 12 June 2013



वक़्त से पहले ही मेरे कदम
चल निकले है मजबूरियों की राह पर
चुनाव नहीं था पास बस चुनना था…..
दो वक़्त की रोटी और मैं
नफरतें सबकी नज़रों से बयां होती है
ऐसे घूरते क्यूँ हो
समझता हूँ औकात अपनी
ये ज़िन्दगी हमने नहीं मांगी थी
कभी मिले जो…..ये सोगात है तुम्हारी
गुनाह हमारा कुछ नही ये मिले विरासत में ….
यही परंपरा हमारी
कभी बहन कभी मैं यूँ ही आती रही बारी हमारी
मैंने दूर से देखा है सुन्दर घर
प्यारे माँ पा मुझे दुलारती मेरी बहना
खिलोनो से भरी मेरी बाहें उन्हें सँभालते नानी नाना
मैं जागा और आँख मली और छू सब हो गया
बस मैं था और बर्तन पुराने
ओह …..ये थे सपने सुहाने
जो अपने घर में जानवर पालते है काश वो मुझे पालें
पर कहाँ बड़े घर वालो के दिल बड़े होते है
यही है वो जिनकी वजह से हम फुटपाथ पे सोते है
पैसा कमाना होता है शौक़
फिर क्यूँ न चलता रहे किसी के घर में शौक
मैं सच अभी से समझा और वक़्त की मार भी
जो हम वक़्त से पहले
बड़े हुए तो वक़्त भी अपना यार हुआ
यही ठीक चलो छोड़े शिकवे
दुनिया भी तमाशेबाजी हुई ,
देख तमाशे ताली पीटी और घरों को चल पड़ी
आज बोलेंगे सब बोलेंगे फिर लबों को स़ी लेंगे
मैं यही था यही रहूँगा चाहे फिर सब चाँद चड़े
रात यही फुटपाथ पर मेरी फिर रात बिना चाँद सही
हाँ मैं बाल मजदूर आज दिन है मेरा
किताबों में अख़बारों में भाषणों में और चंद बातों में
यही मेरी पहचान सही मैं बेनाम सही
मैं एक मजदूर सही......

Friday, 17 May 2013

तकते हो क्या तुम
चेहरे की तामीर को
देख सकते नहीं यूँ
वफा की तस्वीर को

इबादत हुस्न की क्या
हुआ जो तुमने की
भूल जाओगे बस
कुछ रोज़ में इस बात को

लरजते लबो की आरजू
दिल में छुपाये हो
भूले हो क्या अपने
अहम के ख्याल को

इतराते ख्यालों से
जो तुम मदहोश हो
बेवजह की बात है
खोलो बंद आँख को

इक रोज़ इल्म की
राह में जब तुम खड़े हो
ख्याल करना अपने
हर चुभते हर्फ़ को

लायी गर कभी जो
सच्ची भावना मन में
सोच कर उस पल के
सुखद भाव को
गिरा लेना अपने
ओहदे की दीवार को

लानत भेजो महंगे
ऐशो आराम को
रखो अरमां बनाये
तुमको नायाब जो